A Bowl Of Ambrosial Mercy

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One fine day, as I entered the Ashram Prasadam Hall (the dining hall for devotees in Ashram) after Mangala-arati, a young devotee got startled. I noticed condensed mild dripping from his fingers as he was finishing the last bit of - the cool, creamy and irresistible - sweet rice. We both smiled at one another and it was all understood between us. Whether one is a young bhakta or a senior devotee, everyone has some sweet memories associated with this absolute nectar. As it all occured, some nectarean pastimes of the Lord and His devotees, connected to sweet rice flashed in my mind. It the first offering made to the Deities everyday, just before the mangala-arati. This ambrosial prasadam, popularly known as the "sweet rice" in devotee community is a thick and creamy rice pudding garnished with dry fruits and condiments. Remembering the related pastimes itself fills the mind with transcendental sweetness. 

Mother Sita’s Rejuvenation: When mother Sita was abducted by Ravana & kept in Ashoka Groves, she became very weak & use to faint regularly in separation of Lord Rama. As Lord Brahma saw the pitiable situation of mother Sita, he immediately summoned Indra & asked him to take a pot of celestial sweet rice & deliver it to her. Indra followed & reached the Ashoka Groves disguising as a Brahmana along with Nidra Devi. By her influence, all the Rakshasis were put to sleep. He approached mother Sita & humbly offered the pot. Initially Sita was doubtful of his personality, but as Indra showed his real form, she accepted the sweet rice. She made an offering to Lord Ramachandra in meditation & then honored it as His Mahaprasadam. As soon as she ate it, she became freed from all bodily pangs & regained her lost energy & beauty.

Brahmana’s Meditation: Brahma-vaivarta Purana describes about a very poor Brahmana living at the bank of river Godavari. As he could not perform elaborate worship of the Lord because of his poverty, he used to simply meditate on grand, royal devotional activities like bathing the Lord with waters of the holy rivers, dressing Him with silken clothes, constructing lavish thrones for Him, cleansing & decorating the temple, preparing a varieties of preparations etc. Once in meditation, he prepared sweet rice. As it is only offered after being cooled, he wanted to check whether it was still hot before offering it to the Lord. As soon as he touched it, his finger got burnt & this broke his meditation. When he noticed his finger, it was actually burnt. Lord Narayana was observing all this from Vaikuntha. He became very pleased with the Brahmana’s devotion & immediately sent an airplane to bring him Back to Godhead.

Gopinatha-Kshira: As Madhavendra Puri received the order from Gopala deity to bring Sandalwood pulp from Jagannath Puri, he started his journey from Vrindavan & on the way reached the village of Remuna to take darshan of Lord Gopinath there. He came to know about the special sweet rice being offered there & desired to taste it so that he can make a similar offering for his Gopala deity. Soon, he realized that the sweet rice he was meditating on was still unoffered. Feeling greatly ashamed, he left the temple to take shelter in nearby marketplace. As Lord Gopinath was laid down to rest, Lord informed the priest in a dream that He had stolen a pot of sweet rice for Madhvendra Puri & asked the priest to deliver it to him. The priest got up & followed the order in great haste. As Madhavedra Puri was offered the stolen prasadam he relished it in great ecstacy & also ate broken pieces of earthern pot each day. From that day on, Lord became famous as Kshir Chor Gopinath.

Lord Alaranath: Long ago, there was a temple priest Ketana who asked his young son Madhu to make offerings to the Lord while he was outstation for some work. Madhu agreed. As he was not knowing the procedures to offer food to the deity, he simply placed the bhoga plate in front of the Lord and prayed to Him to accept the offering. He then went out to play with his friends. After some time, he came and saw that the plate still contained the food. He then began to cry and fervently prayed to the Lord to accept the food. As he went out again and to his great joy, found the plate empty when he came back. After 3 days, when the priest returned and found that his family was fasting for the last three days without prasadam. Madhu informed that the Lord was eating the entire offering every day. He had no faith in the words of his son & wanted to find out the truth. Accompanied by his father, Madhu went in front of the Deity & prayed to the Lord to accept it and then went out. Ketana who was hiding at the altar saw that Lord Alarnatha was personally taking a pot of sweet rice to eat. As he rushed to the Lord and grabbed His arm to prevent Him from taking it, the hot sweet rice spilled out and fell on the Lord’s body causing burns. The same burnt marks on Lord Vishnu’s body can be seen till today.

एक दिन मैं सुबह सुबह मंगलारती के बाद हमारे आश्रम के प्रसाद कक्ष में दाखिल हुआ तो मैंने देखा की एक उपस्थित भक्त तुरंत सतर्क हो गया है। कारन जानने के लिए जब मैंने गौर किया तो देखा कि उसकी उँगलियों के बीच से गाढ़ा दूध टपक रहा था। और वह शीतल, रसीली और मुग्ध करनेवाली चावल की खीर खा रहा था, जो भक्त समुदाय में "स्वीट राइस" के नाम से प्रसिद्द है। हम दोनों एक दूसरे की ओर मुस्कुराए और आपस में सब कुछ समझ लिया । इस घटना ने मुझे 'स्वीट राइस' से जुडी भगवान् और उनके भक्तों की लीलाओं का स्मरण करवा दिया।  इन लीलाओं का स्मरण ही मन को दिव्य माधुर्य से भर देता है। 

माता सीता की क्षतिपूर्ति

जब रावण ने माता सीता का अपहरण कर उन्हें अशोक वाटिका में कैद किया था, तब भगवान् श्री राम के वियोग में वे अत्यंत दुर्बल हो गयी थी और पुनः पुनः वे मूर्छित हो जाती थी। जब ब्रह्मा जी ने उनकी यह दयनीय स्थिति देखि तो तुरंत इंद्रदेव को निर्देश दिया की दैवी खीर का एक पात्र लेकर सीतादेवी को दें। देवराज इंद्र एक ब्राह्मण का भेस धारण कर, निद्रादेवी के साथ अशोक वाटिका पहुंचे। निद्रादेवी ने अपने प्रभाव से सभी राक्षसियों को सुला दिया और इंद्रदेव ने विनम्रता से सीतादेवी को वह दैवी खीर का पात्र सौंपा। प्रारम्भ में सीतादेवी को इंद्र पर शंका हुई, किन्तु इंद्र ने अपना वास्तविक रूप दिखाया और सीतादेवी ने पात्र स्वीकार किया। उन्होंने ध्यान लगाकर भगवान् श्री राम को वह अर्पण किया और तत्पश्चात उसे महाप्रसाद के रूप में ग्रहण किया। जैसे ही उन्होंने वह ग्रहण किया, वह समस्त शारीरिक क्लेशों से नुक्त हो गयी और उनका बल और सौंदर्य वापिस लौट आया।


ब्राह्मण द्वारा ध्यान

ब्रह्म वैवर्त पुराण में गोदावरी के तट पर रहनेवाले एक गरीब ब्राह्मण का उल्लेख है। वे अपनी गरीबी के कारण भगवान् की भव्य सेवा करने में असक्षम थे तो वे अपने ध्यान में ही भगवान् नारायण की वैभवशाली रूप से सेवा पूजा करते थे। उनकी ध्यानमय सेवाओं में नियमित रूप से भगवान् का पवित्र नदियों के जल से अभिषेक करना , रेशम के वस्त्र पहनाना, आभूषणों से सुसज्जित करना, रत्न जड़ित सिंहासन पर विराजमान करना, उनके मंदिर को सजाना और नाना प्रकार के व्यंजन अर्पित करना शामिल था। एक बार ध्यान में उन्होंने भगवान् नारायण के लिए 'स्वीट राइस' बनाया। यह व्यंजन शीतल होने के बाद ही खाया जाता है, तो वे भोग लगाने के पहले देखना चाहते थे की कहीं यह गरम तो नहीं है। जैसे ही उन्होंने उसको स्पर्श किया, उनकी उंगली जल गयी और उनका ध्यान टूट गया। उन्होंने देखा की उनकी उंगली वास्तव में ही जल गई है। भगवान् नारायण वैकुण्ठ से यह सब देखकर मुस्कुरा रहे थे। वे से अत्यंत प्रसन्न हुए और ब्राह्मण को वैकुण्ठ लाने के लिए विमान भेजा।



जब श्री माधवेन्द्र पूरी को भगवान् गोपाल द्वारा जगन्नाथ पूरी से चन्दन लाने का आदेश प्राप्त हुआ तो वे वृन्दावन से चल पड़े।  रस्ते में उन्होंने रेमूना नामक ग्राम में भगवान् गोपीनाथ का दर्शन किया। वहाँ उन्हें भगवान् को अर्पण होनेवाले विशेष 'स्वीट राइस' का पता चला और उन्होंने उसे चखने की इच्छा की ताकि वे वृन्दावन लौटकर भगवान् गोपाल को अर्पित कर सकें । जल्द ही उनको आभास हुआ की वे जिस 'खीर' को वे चखना चाहते हैं वो भगवान् को अभी तक अर्पण नहीं हुई । लज्जित होकर वे मदिर से निकल गए । शाम को मंदिर के पुजारी ने भगवान् को खीर अर्पण की और विश्राम दिया। पुजारी हो स्वप्न में भगवान् गोपीनाथ ने बताया की खीर का भोग लेते समय उन्होंने एक पात्र अपने भक्त माधवेन्द्र पूरी के लिए चुरा लिया था। अब पुजारी वह पात्र लेकर उन्हें सौंप दे। पुजारी तुरंत उठे और माधवेन्द्र पूरी को ढूंढकर वह खीर का पात्र सौंपा, जिसे उन्होंने भावविभोर होकर स्वीकार किया। और उस दिन से भगवान् क्षीर चोर गोपीनाथ के नाम से प्रसिद्ध हुए।


भगवान् अलारनाथ

अनेक वर्षों पूर्व केतन नमक एक पुजारी ने विदेश यात्रा पर जाते समय अपने पुत्र मधु को भगवान् को भोग अर्पण करने का कार्यभार सौंपा। मधु को अधिक जानकरी न होने के कारण उसने भोग की थाली भगवान् के समक्ष रखकर उनसे स्वीकार करने की प्रार्थना की । फिर वह अपने दोस्तों के साथ खेलने चला गया । और जब लौटकर देखा तो थाली में भोजन वैसा ही था। वह ज़ोर ज़ोर से रोने लगा की भगवान् भोजन को खाएं। वह पुनः बाहर गया और लौटकर देखा की थाली खाली है।  तीन दिनों के बाद ब्राह्मण घर लौटा तो उसे पता चला कि उसका परिवार तेन दिनों से उपवास कर रहा है। पुत्र ने बताया कि रोज़ भगवान् पूरा भोग खा लेते हैं । ब्राह्मण को पुत्र की बातों पर विश्वास नहीं था तो वह स्वयं देखना चाहता था इसलिए भोग लगाते समय वह छुप गया। जब मधु ने भोग की टाहली बहगवां के समक्ष राखी और प्रार्थना की तो भगवान् अपने हाथों में खीर का पात्र लेने लगे। यह देखते ही केतन ने भागकर भगवान् का हाथ पकड़ लिया ताकि भगवान् खीर न ले सकें । इस छिना झपटी में कटोरी से गरम खीर भगवान् पर गिर गई और उनकी त्वचा जल गई। यह जलने के निशान आज भी भगवान् अलारनाथ पर देखे जा सकते हैं।