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Karma And Its 5 Principles

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What is Karma?

Karma is a mysterious subject matter. In general karma is understood to be action. Lord Krishna explains in Bhagavad-gita, “Action pertaining to the development of these material bodies is called karma, or fruitive activities.” Every action performed by is subjected to ‘law of karma’. What is that law of karma?

1. Bad things don’t happen to good people

The first principle of karma is – as you sow, so shall you reap. No reaction comes without our havig performed the action. If we are suffering then surely we have done wrong. Whether we are suffering due to a minor headache or a terrible affliction like Tsunami, we are responsible through our actions. It is not wise to blame others, as they act only as instruments in giving us the results.

2. Our karma doesn’t belong to this life alone

Often people wonder that when they haven’t done anything wrong in this life then why are they suffering. The answer is that everything that we enjoy or suffer in this life is not the result of this life’s actions alone. It takes different intervals for different actions to fructify. If we put finger in fire, it immediately burns but it takes few hours to digest the food and get energized. Similarly some actions fructify in this life while others fructify in the next.

3. Pious and sinful actions are decided by Shastra.

Often people think sin to be ‘doing wrong’ and wrong means what they feel wrong. But the laws of karma are established by God, so our opinions don’t hold good. Just like the laws of this country are given in Indian Penal Code and whatever it prohibits is called crime. Similarly the governing laws of this universe are given in the scriptures and whatever they prohibit are called sin. Pious action and sin cannot be decided by just as the state law is not decided by us but by the authorities. Therefore to understand the principles of pious and sinful actions, we must refer the scriptures.

4. Ignorance of law is no excuse

If a motorist doesn’t halt at red signal then he will surely be fined. If he argues that he wasn’t aware of the law, will the police spare him? No. It’s the duty of driver to learn traffic laws. Ignorance of law cannot be an excuse. Similarly, being the denizen of this creation, it is our responsibility to learn the laws of creation. This is the prime duty of human life. We must learn right and wrong from the scriptures, and then only we can expect independence and happiness.

5. Only devotional service can give liberation

Whether good or bad, one must suffer the reactions of every action. For that one must be ready to take repeated births. In life after life we perform countless actions and thus, the cycle of karma goes on endlessly. Lord Krishna reveals in the Gita secret to breaking out of this cycle, which is to engage in devotional service and surrender unto Him. He promises to deliver us from all our sins. Surrender means to obey His instruction. His top most instruction is to chant His holy name.  

कर्म और उसके पाँच सिद्धांत

कर्म क्या है ?

कर्म एक बहुत ही रहस्यमयी विषय है । सामान्यतया कर्म का अर्थ माना जाता है काम या क्रिया । भगवद्गीता में भगवान् कृष्ण कर्म की परिभाषा देते हैं, “जीवों के भौतिक शरीर से सम्बंधित गतिविधि कर्म या सकाम कर्म कहलाती है ।“ यह सभी कर्म भगवान् के बनाए नियमों के अधीन आते हैं । क्या हैं वो कर्म के नियम ?

 

1. भले लोगों के साथ बुरा नहीं होता

कर्म का सर्वप्रथम सिद्धांत है - जैसा करोगे वैसा भरोगे । बिना हमारे कर्म किये हमें कोई फल नहीं मिलता । यदि हम पर कष्ट आ रहे हैं तो निश्चित है कि हमसे बुरे कर्म हुए हैं । चाहे कष्ट सिरदर्द जैसे छोटे हों या सुनामी जैसे भयंकर, हमारी पीड़ा के लिए हम स्वयं ज़िम्मेदार हैं । अन्य व्यक्ति पर दोष डालना समझदारी नहीं है, वे तो केवल निमित्त हैं हमारे कर्मों का फल दिलाने में ।

2. हमारे कर्म केवल इस जन्म के नहीं हैं

लोग प्रश्न उठाते हैं कि जब उन्होंने जीवन में कुछ गलत नहीं किया तो क्यूँ उनपर कष्ट आ रहे हैं । इसका उत्तर यह है कि इस जन्म में हम जो कुछ भुगत रहे हैं वह केवल इस जन्म के कर्मों के ही फल नहीं है अपितु पूर्व जन्म के कर्मों का भी फल है । विभिन्न कर्मों को फलित होने के लिए अलग अलग अवधि लगती है । आग में हाथ डालें तो तुरंत जलेगा किन्तु भोजन से शक्ति प्राप्त करने में कुछ घंटे लगेंगे । इसी तरह कुछ कर्म इसी जन्म में फलित होते हैं और कुछ आगामी जन्मों में ।

3. पाप और पुण्य शास्त्र निर्धारित करते हैं

सामान्यतया लोग सोचते हैं पाप का अर्थ गलत कार्य है और गलत वह है जो उन्हें गलत लगे । किन्तु “कर्म के नियम” तो भगवान् द्वारा दिए हुए कानून हैं और इसमें हमारे विचार महत्वहीन हैं। जैसे हमारे देश का कानून भारतीय दण्ड संहिता में दिया गया है और उसमें प्रतिबंधित कार्य अपराध कहलाते हैं , वैसे ही सृष्टि के कानून शास्त्रों में दिए गए हैं और उनमें प्रतिबंधित कार्य पाप कहलाते हैं । पाप और पुण्य निर्धारण हमारे द्वारा नहीं बल्कि शास्त्रों द्वारा होता है जैसे कानून का निर्धारण हमारे द्वारा नहीं बल्कि सरकार द्वारा होता है । पाप और पुण्य को तत्वतः जानने के लिए हमें केवल शास्त्रों से ही सीखना होगा ।

4. कानून की अज्ञानता - बहाना नहीं बन सकती

यदि कोई वाहन चालक सड़क पर लाल बत्ती पर न रुके तो निश्चित ही उसे पुलिस पकड़ेगी । यदि वह तर्क दे, “मुझे कानून मालूम नहीं था ।" तो क्या पुलिस उसे क्षमा करेगी? नहीं । क्योंकि नियमों को जानना वाहन चालक का दायित्व है । नियमों का अज्ञान हमें क्षमा का पात्र नहीं बनाता । उसी प्रकार हम इस सृष्टि में रह रहे हैं तो हमारा दायित्व है यहाँ के नियमों को जानना । और यही मनुष्य जीवन का कर्तव्य भी है । हमें शास्त्रों से सही और गलत सीखना है। तभी हम स्वतंत्र और सुखी रह सकते हैं।

5. केवल कृष्ण कर्म से ही मुक्ति संभव

अच्छे या बुरे, दोनों ही प्रकार के कर्मों का फल हमे  भोगना ही होता है जिसके लिए अनेकानेक जन्म लेने होते हैं । हर जन्म में हम और नए कर्म करते हैं जिससे यह सिलसिला चलता ही रहता है और मोक्ष की कोई आशा नहीं रहती। गीता में इस कर्म चक्र को काटने के लिए भगवान् कृष्ण कहते हैं की हमें भक्ति के कार्य करने चाहिए और उनके आगे शरणागत हो जाना चाहिए।  वे वचन देते हैं कि वे हमारे सारे पापों को नष्ट कर देंगे।  शरणागति का अर्थ है भगवान् के आदेश का पालन करना । और उनका सर्वोपरि आदेश है उनके पवित्र नाम का जप करना।